आज मन में कई प्रतिद्वंदी नज़रियों का मंथन चल रहा है , सो अगर नीचे लिखी बातें सिलसिलेवार ढंग से लिखी न दिखें तो क्षमा चाहूँगा |
दुर्योधन के आंसू
महाभारत के आखिरी दिन , टूटा सा , कराहता दुर्योधन सिसक रहा है | मृत्यु पास है , आज आँखों का पानी किसलिए है ?
दुनिया , वे कहते थे , एक रंगमंच है , लीला -निमेष | आज द्वापर युग के विनाशकारी युद्ध के बाद ही अहसास होता है कि रंगमंच का पर्दा खींचता हुआ नीचे आ रहा है | वो द्वेष , वो मित्रता , वो अन्याय, वो कपट , वो प्रेम - हर एक ढांचा समय की लहरें निगल रही हैं | आज जब इस नाटक पर पर्दा गिरेगा तो सबके सब साहित्य , नाटक और इतिहास के किरदार रह जायेंगे | हाँ, सबके सब , कलाकारों की सूची में एक के नीचे एक - धृतराष्ट्र , युधिष्ठिर, पांचाली , भीम , दुर्योधन , श्रीकृष्ण , अर्जुन... | कुछ भी सदा के लिए नहीं रहा , न भीम से इर्ष्य , न कर्ण से मित्रता , न द्रौपदी के प्रति वासना | वो जो सागर की तरह अथाह भावनाएं थीं, अब किताबों के चाँद पन्नों में बांध कर रह गयीं |
दुर्योधन रोया था - अपने अपमान के लिए नहीं , न पछतावे की ग्लानि से ; सिर्फ एक नाटक के अंत के लिए | कहीं एक रेगिस्तान में एक और पर्दा गिरा | आज इस अंतिम समय भी सब मीठा नहीं लग रहा , पर मुझे कडवाहट और खट्टेपन की प्यास है| मैं भी शकुनि की तरह छल करना चाहता हूँ, भीष्म की तरह प्रतिज्ञाओं पर खरा उतरना चाहता हूँ , कर्ण और एकलव्य की भांति अन्याय की टीस सहनी है , वीरानी में बैठे किसी महापुरुष से गीता सुननी है |मैं सिसकता हूँ , इस बनावटी दुनिया की भावनाओं के लिए , आवेश के लिए - जिसका समय मखौल उड़ा रहा है |
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"दुर्योधन रोया था - अपने अपमान के लिए नहीं , न पछतावे की ग्लानि से ; सिर्फ एक नाटक के अंत के लिए" : अनिवार्यता में झूलता एक कठोर सत्य | :)
ReplyDelete@Nimish: Tum hi socho, jis duniya ke liye lade, jiye mare, wo duniya hi agar khatm ho jaye, to fir tumhari zindagi, tumhari har ek mehnat ka kitna bada parihaas hai.
ReplyDeleteDo u think ur fight was for this 'duniya' or entry to some other 'duniya' ?
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